
कहते हैं कि शिक्षा प्रदान करना सबसे पुनीत कार्य है और शिक्षक माता पिता के पश्चात सर्वथा पूज्यनीय होते हैं। लेकिन यह कैसे शिक्षक हैं जो अध्यापन की शिक्षा ग्रहण करने महाविद्यालय ही नहीं आते और घर बैठे ही बीएड/डीएडडिग्रीधारी हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है किंतु संभवतः किसी प्रलोभन से सब संभव होता प्रतीत होता है। कई महाविद्यालय ऐसे हैं जहां नाम को तो शिक्षक हैं लेकिन यथार्थ में कोई शिक्षक उपलब्ध नहीं। हमारी टीम ने कई महाविद्यालयों की पड़ताल की जिसका खुलासा जल्द ही सत्यनाद करेगा।






